GST Kya Hota Hai जीएसटी क्या है, जीएसटी की सम्पूर्ण जानकारी

GST Kya Hota Hai, टैक्स किसी भी देश की सरकार को चलाने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है, आमतौर पर सभी नागरिक कुछ न कुछ टैक्स अवश्य देते है जिससे देश को सुचारु रूप से चलाने में मदद मिलती है।

कुछ साल पहले तक भारत में अलग-अलग तरह के टैक्स और इसको कैलकुलेट करने के तरीके हुआ करते थे, लेकिन को भारत सरकार ने भारतीय टैक्स व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव करते हुए, एक नए टैक्स सिस्टम की शुरुआत की।

सालों से चली आ रही पुरानी टैक्स व्यवस्था के स्थान पर एक मुख्य उद्देश्य “एक देश एक कर” के सिद्धांत पर “GST” की शुरुआत की गई।

Hello Dosto, स्वागत है आप सभी का हमारे ब्लॉग में आज हम बात रकने जा रहे है जीएसटी के बारे में, जीएसटी क्या है GST Kya Hota Hai, यह कैसे काम करता है, नई टैक्स व्यवस्था के क्या फायदे है, तथा इससे जुड़ी कुछ अन्य चीजों के बारे में भी।

GST Kya Hota Hai –

जीएसटी का फुल फॉर्म “वस्तु एवं सेवा कर” (Goods And Service Tax) है, इसे पहली बार 28 फरवरी 2006 को प्रस्तुत बजट भाषण में पेश किया गया था।

जीएसटी ने भारत की अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में संपूर्ण सुधार की नींव रखी।

कई सालों के बाद इसपर विचार करते हुए, 1 जुलाई 2017 को “वस्तु एवं सेवा कर अधिनियम” के रूप में लागू किया गया, इस प्रकार अप्रत्यक्ष कराधान प्रणाली अपनी स्थापना के बाद से संशोधनों की एक श्रृंखला से गुज़री।

GST Kya Hota Hai
GST Kya Hota Hai

सरकार के द्वारा किए गए इस कर सुधार के साथ, जीएसटी ने विभिन्न वस्तुओं और सेवाओं पर लगाए गए कई अप्रत्यक्ष करों का स्थान ले लिया।

जीएसटी के पहले सेंट्रल गवर्मेंट और स्टेट गवर्मेंट के बीच बहुत तरह के अलग-अलग टैक्स कार्य कर रहे थे।

इतने अलग-अलग तरह के टैक्स के कारण बहुत सी असुविधाएं उत्पन्न हो रही थी, इन अलग-अलग तरह के करों के स्थान पर एक ऐसे कर व्यवस्था की जरूरत महसूस हो रही थी जो ज्यादा सुविधाजनक हो।

केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) इस कर से संबंधित सभी परिवर्तनों और संशोधनों को नियंत्रित करने वाली नियामक संस्था है।

एक भारत एक कर की आवधारणा पर आधारित जीएसटी पूरे देश के लिए इनडायरेक्‍ट टैक्‍स है, जो भारत को एक समान बाजार बनाने में मददगार होगा।

जीएसटी के पहले केंद्र और राज्‍यों के 20 से ज्‍यादा इनडायरेक्‍ट टैक्‍स काम कर रहे थे, इसके आने से पहले तक एक ही चीज के लिए दो राज्यों में अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ती थी।

इसकी वजह अलग-अलग राज्यों में लगने वाले टैक्स हैं, इसके लागू होने पर सभी राज्यों में लगभग सभी गुड्स एक ही कीमत पर मिलेंगे और देश बहुत हद तक सिंगल मार्केट बन जाएगा।

जीएसटी के आने से लॉटरी टैक्स, स्टैंप ड्यूटी, एक्‍साइज ड्यूटी, सेंट्रल सेल्स टैक्स (सीएसटी), स्टेट के वैट/सेल्स टैक्स, सर्विस टैक्स, एडिशनल कस्टम ड्यूटी, स्पेशल एडिशनल ड्यूटी ऑफ कस्टम, एटरटेनमेंट टैक्स, ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स, लग्जरी टैक्स, टेलिकॉम लाइसेंस फीस, बिजली के इस्तेमाल या बिक्री पर टैक्स, एंट्री टैक्स, टर्नओवर टैक्स, और गुड्स के ट्रांसपोर्टेशन पर लगने वाले टैक्स काम नहीं करेंगे।

जीएसटी के उद्देश्य –

अभी वर्तमान समय में, भारतीय टैक्स सिस्टम, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर के रूप में दो भागों में विभाजित है।

अब इसमें प्रत्यक्ष कर या डायरेक्ट टैक्स वह हैं जिसमें देनदारी किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं दी जा सकती।

इसके एक उदाहरण की बात करें तो ‘आयकर’ एक ऐसा टैक्स है जहां आप आय अर्जित करते हैं और केवल आप उस पर कर का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी हैं।

लेकिन अप्रत्यक्ष करों के मामले में, टैक्स की देनदारी किसी अन्य व्यक्ति को दी जा सकती है।

इसका मतलब यह है कि जब दुकानदार अपने बिक्री पर वैट देता है तो वह अपने ग्राहक को वह ट्रांसफर कर सकता है |

जिसके कारण ग्राहक आइटम की कीमत और वैट पर भुगतान करता है ताकि दुकानदार सरकार को वैट जमा कर सके।

इसका मतलब ग्राहक न केवल उत्पाद की कीमत का भुगतान करता है, बल्कि उसे कर दायित्व भी देना पड़ता है, और इसलिए, जब वह किसी आइटम को खरीदता है तो उसे अधिक खर्च करना पड़ता है।

अब यह सब इसलिए होता है क्योंकि दुकानदार ने जब वह आइटम थोक व्यापारी से खरीदा था तब उसे कर का भुगतान करना पड़ा था।

वह राशि वसूल करने के साथ ही सरकार को भुगतान किए गए वैट की भरपाई के लिए वह अपने ग्राहक को ट्रांसफर कर देता है जिसे अंतिम छोर पर मौजूद कस्टमर को अतिरिक्त राशि का भुगतान करना पड़ता है।

अब इस लेन-देन के दौरान दुकानदार के लिए अपनी जेब से जो भी भुगतान करता है, उसके लिए रिफंड का दावा करने का कोई दूसरा तरीका नहीं है और इसलिए, उसके पास ग्राहक इस टैक्स को कस्टमर को ट्रांसफर करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचता है।

इन सब चीजों को देखते हुए पिछले कई सालों से एक ऐसे टैक्स सिस्टम की परिकल्पना की जा रही थी जिसमें इन सभी समस्याओं का हल निकाला जा सके, इसलिए जीएसटी को लागू करने के पीछे प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित है…

‘एक राष्ट्र, एक कर’ –

जीएसटी को ‘एक राष्ट्र, एक कर’ नामक मुख्य उद्देश्य और नीति के साथ पेश किया गया, इसने पहले से मौजूद कई अप्रत्यक्ष करों की जगह ले ली है।

इसे किसी सेवा/उत्पाद के लिए निर्धारित कर दरें प्रदान करने के लिए पेश किया गया था जिसका हर राज्य पालन करेगा। इसने करों और अनुपालनों को प्रशासित करना भी सरल बना दिया।

अप्रत्यक्ष करों को समेटना –

वस्तुओं और सेवाओं पर एक केंद्रीकृत और एकीकृत कर प्रणाली बनाने के लिए भारत में जीएसटी लागू किया गया था।

इसके कानूनों के तहत, प्रशासन को सरल बनाने के लिए अधिकांश अप्रत्यक्ष करों को एक में समाहित कर दिया गया।

कर चोरी रोकने के लिए –

जीएसटी के लागू होने से पहले, कर चोरी की दर बहुत अधिक थी और चोरी पर अंकुश लगाने और एक केंद्रीकृत कर निगरानी प्रणाली बनाने के लिए, भारत में जीएसटी लागू किया गया था।

जीएसटी ने कर चूक कर्ताओं की संख्या को कम करने में प्रभावी रूप से योगदान दिया है।

जीएसटी के फायदे –

GST पहले से चले आ रहे टैक्स ढांचे की तरह कई जगहों पर न लग कर सिर्फ डेस्टिनेशन पॉइंट पर लगेगा।

पहले वाली टैक्स व्यवस्था के मुताबिक किसी सामान पर फैक्ट्री से निकलते समय टैक्स लगता है और फिर रीटेल पॉइंट पर भी जब वह बिकता है, तो वहां भी उस पर टैक्स जोड़ा जाता है।

जीएसटी टैक्सेशन के नए सिस्टम से जहां भ्रष्टाचार में कमी आएगी, वहीं लालफीताशाही भी कम होगी और पारदर्शिता बढ़ेगी।

सरकार को फायदे –

GST के प्रयोग से टैक्स स्ट्रक्चर आसान होगा और टैक्स बेस बढ़ेगा, इसके दायरे से बहुत कम सामान और सेवाएं बच पाएंगे, ज्यादा से ज्यादा लोगों और सेवाओं को यह कवर करता है।

एक अनुमान के मुताबिक GST व्यवस्था लागू होने के बाद एक्सपोर्ट, रोजगार और आर्थिक विकास में जो बढ़ोतरी होगी, उससे देश को सालाना अरबों रुपये की आमदनी होगी।

आम आदमी को फायदे –

GST सिस्टम में केंद्र और राज्यों, दोनों के टैक्स सिर्फ बिक्री के समय वसूले जाएंगे।

साथ ही ये दोनों ही टैक्स मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट के आधार पर तय होंगे। इससे सामान और सेवाओं के दाम कम होंगे और आम कन्जयूमर को फायदा होगा।

कंपनियों को फायदे –

गुड्स और सविर्सेज के दाम कम होने से उनकी खपत बढ़ेगी, इससे कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा।

इसके अतिरिक्त कंपनियों पर टैक्स का औसत बोझ कम होगा, टैक्स सिर्फ बिक्री के पॉइंट पर लगने से प्रॉडक्शन कॉस्ट कम होगी, इससे एक्सपोर्ट मार्केट में कंपनियों की प्रतिस्पर्द्धी क्षमता बढ़ेगी।

सभी राज्यों का विकास –

पहले के टैक्स सिस्टम में सभी राज्य अपने हिसाब से अलग-अलग तरह के टैक्स लगाते थे।

जिसका फायदा यह होता था कि जिस राज्य में टैक्स रेट कम है कंपनियां उस राज्य में अपनी मैन्युफैक्चरिंग करती थी।

और ज्यादातर कंपनियां ऐसे ही राज्यों में अपनी फैक्ट्री बनाती थी जिसके कारण यहाँ तो रोजगार के अवसर बन जाते लेकिन बाकी के राज्यों में बेरोजगारी की दर ज्यादा होती थी।

जीएसटी के आने से सभी राज्यों में टैक्स सिस्टम एक समान हो गया है, जिससे कोई भी कंपनी भारत के किसी भी कोने में मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाए उसे टैक्स की एक समान लागत आएगी।

अगर उदाहरण के तौर पर बात करें तो गुजरात में टैक्स रेट कम होने से बहुत सी कंपनियों के मैन्युफैक्चरिंग यूनिट यहाँ पर है जिसके कारण आज गुजरात भारत के समृद्ध राज्यों में से एक है।

वहीं बिहार में स्थिति ठीक इसके उलट है जहां रोजगार के ऐसे अवसर बहुत कम है और इसके कारण यहाँ की कामगारों की बहुसंख्यक आबादी दूसरे राज्यों में पलायन करती है।

जीएसटी का इतिहास –

सन् 2000 में, भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री ने वस्तु एवं सेवा कर की अवधारणा पेश की।

उन्होंने नए अप्रत्यक्ष कर कानून का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति भी बनाई।

हालाँकि, इसके कार्यान्वयन में 17 वर्ष और लग गए और इस बीच, बिल कई प्रस्तुतियों, संशोधनों और पुनर्निर्धारण की प्रक्रियाओं से होकर गुजरा।

2000 – भारत के लिए जीएसटी कानून का मसौदा तैयार करने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा गठित समिति की गई।

2004 – गठित की गई एक टास्क फोर्स ने इस कानून को लागू करने और भारत में अप्रत्यक्ष कर प्रणाली में सुधार की आवश्यकता बताई।

2006 – भारत के वित्त मंत्री द्वारा 1 अप्रैल 2010 को वस्तु एवं सेवा कर लागू किया जाना निर्धारित किया गया।

2007 – केंद्रीय बिक्री कर (सीएसटी) को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने का निर्णय लिया गया और नतीजतन, सीएसटी दरें 4% से घटाकर 3% कर दी गईं।

2008 – अलग-अलग कानून और लेवी के लिए ईसी द्वारा जीएसटी की दोहरी संरचना (डुएल जीएसटी) को अंतिम रूप दिया गया था।

2010 – संरचनात्मक और कार्यान्वयन बाधाओं के कारण जीएसटी परिचय को स्थगित करना। वाणिज्यिक करों के कम्प्यूटरीकरण के लिए एक परियोजना शुरू की गई।

2011 – वस्तु एवं सेवा कर कानून को सक्षम बनाने के लिए संविधान संशोधन विधेयक का परिचय।

2012 – संसद की स्थायी समिति द्वारा शुरू की गई टैक्स को लेकर चर्चा, खंड 279बी (279B) के संबंध में स्पष्टता के अभाव के कारण रुका हुआ हुआ था।

2013 – संसद की स्थायी समिति ने जीएसटी की रिपोर्ट पेश की।

2014 – भारत के वित्त मंत्री ने वस्तु एवं सेवा कर विधेयक को संसद में फिर से पेश किया।

2015 – लोकसभा ने बिल को मंजूरी दे दी, लेकिन राज्यसभा में यह रुका हुआ है।

2016 – वस्तु एवं सेवा कर नेटवर्क (जीएसटीएन) लाइव हो गया। कानून का संशोधित मॉडल संसद के दोनों सदनों में पारित हो गया और भारत के राष्ट्रपति से इसे मंजूरी मिल गई।

2017 – कैबिनेट ने लोकसभा और राज्यसभा द्वारा पारित जीएसटी पर चार अनुपूरक विधेयकों को मंजूरी दे दी इसके बाद वस्तु एवं सेवा कर कानून 1 जुलाई 2017 को लागू कर दिया गया।

जीएसटी के बाद सम्मिलित कर –

जीएसटी कार्यान्वयन के बाद सम्मिलित करों की सूची के रूप में गुड सर्विस टैक्स को एक व्यापक अप्रत्यक्ष कर संरचना के रूप में पेश किया गया।

नई टैक्स व्यवस्था में इस शुरूआत के साथ, सरकार का लक्ष्य लगाए गए सभी अप्रत्यक्ष करों को एक अम्ब्रेला के नीचे समेकित करना था।

इसके आने के बाद, वस्तुओं के आयात पर लगाए जाने वाले सीमा शुल्क को छोड़कर, वस्तु एवं सेवा कर ने कई अप्रत्यक्ष करों का स्थान ले लिया।

जीएसटी के इस सिस्टम ने कर के नियम कार्यान्वयन और संग्रह प्रक्रिया में अक्षमता के संबंध में अपनी पिछली अप्रत्यक्ष कर संरचना की सीमाओं को दूर करने में मदद की।

वस्तु एवं सेवा कर में सम्मिलित अप्रत्यक्ष करों की सूची निम्नलिखित है-

केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए अप्रत्यक्ष करों की सूची –

  • केंद्रीय बिक्री कर (Central Sales Tax)
  • सेवा कर (Service Tax)
  • केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Central Excise Duty)
  • उत्पाद शुल्क (अतिरिक्त) (Excise Duty (Additional)
  • प्रतिकारी शुल्क या अतिरिक्त सीमा शुल्क (Countervailing Duty or Additional Customs Duty)
  • विशेष अतिरिक्त सीमा शुल्क (Special Additional Customs Duties)

राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए अप्रत्यक्ष करों की सूची –

  • राज्य वैट (State VAT)
  • प्रवेश कर और चुंगी शुल्क (Entry Tax and Octroi Duty)
  • लक्जरी टैक्स (Luxury Tax)
  • मनोरंजन एवं मनोरंजन कर (Amusement and Entertainment Tax)
  • विज्ञापनों पर कर (Taxes on Advertisements)
  • उपकर और अधिभार से संबंधित सामान और सेवाएँ (Goods and services related to cess and surcharges)
  • खरीद कर (Purchase Tax)
  • सट्टेबाजी, लॉटरी और जुए पर टैक्स (Tax on betting, lottery and gambling)

जीएसटी के प्रकार –

CGST – सीजीएसटी यानी सेंट्रल जीएसटी, टैक्स को एकत्र करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार के अंतर्गत आती है।

SGST – एसजीएसटी अथवा स्टेट जीएसटी, यह टैक्स राज्य सरकारें एकत्र करती है।

IGST – आईजीएसटी या संक्षेप में कहें तो इंटिग्रेटेड जीएसटी, यदि कोई बिजनेस दो राज्यों के बीच होगा तो उस पर यह काम करता है, इस टैक्स को केंद्र सरकार एकत्र करती है और उन राज्यों के बीच बराबर बाँट देती है, जिनके बीच वह बिजनेस हुआ है।

Union Territory GST – केंद्र सरकार के द्वारा एडिमिनिस्ट्रेट किए जाने प्रांतों के गुड्स, सर्विस या दोनों पर लगता है, इस टैक्स को भी केंद्र सरकार ही एकत्र करती है।

जीएसटी कैसे काम करता है? –

ऐसे बिजनेस जिनका सलाना टर्नओवर 20,000,00 से अधिक होता है, वो जीएसटी के दायरे में आते है।

इसके अलावा यदि आप एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रोडक्ट सेल करते है तो वहाँ पर टर्नओवर कितना भी हो वह बिजनेस जीएसटी के दायरे में आता है।

यदि आपका बिजनेस ऑनलाइन काम करता है तो बिजनेस का टर्नओवर कितना भी हो, आपका बिजनेस जीएसटी के दायरे में आता है।

हालांकि पहाड़ी क्षेत्रों जैसे – अरुणांचाल प्रदेश के लिए टर्नओवर की सीमा 10,000,00 रखी गई है।

अब जीएसटी के काम करने के तरीके को समझने से पहले, पहले के समय में चल रहे पुराने टैक्स सिस्टम को समझते है।

A Student 📚, Digital Content Creator, Passion in Photography. इस ब्लॉग पर आपको टेक्नॉलजी, फाइनेंस और पैसे कमाने के तरीके से संबंधित टॉपिक्स पर जानकारियाँ मिलती रहेंगी, हमारे साथ जुड़ें - यूट्यूब, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर

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